मंगलवार, 3 मार्च 2009
भूल कर भी खुशी
आजकल अमीर लोगों न जाने क्यो यह परम्परा चली आरही हैं की वो अपनी मत लिए गरीब को अपना मोहरा बनाकर उससे काम निकलने पर उसे भूल जाते हैं
अब आप स्ल्म्दोग फ़िल्म ले लीजिये उसमें जो छोटे बचो ने भूमिका निभाई हैं उनके परिवार वालों को कुछ पैसे देकर रफा दफा कर दिया हैं उन बचो को जो की एक कुख्याति प्राप्त हुई और वो उस उचाई पर पहुच कर फ़िर
उसी जिन्दगी मैं आकर जी रहे हैं
यह एक कहानी ही हैं कुछ सालों पहले ही भारत मैं
एक फ़िल्म बनी थी जिसका नाम था सलाम मुंबई उसे भी एक लड़के कम वह उस फ़िल्म मैं मुख्या भूमिका निभाने वाला आज बंगलौर मैं ओउतो रिक्शा चालक हैं जिसका नाम हैं सफीक पर वो आज वैसे कम वैसे ही हैं
बताओ क्या होगा उनका जो उसे उचाई पर पहुच कर भी दुबारा उसी जगह आकर वही जिन्दगी बिता रहे हैं
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